लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक, इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक बार फिर अपने आंदोलन को लेकर चर्चा में हैं। वे पिछले 18 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनका कहना है कि लद्दाख के पर्यावरण, स्थानीय संस्कृति और लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार को जल्द ठोस कदम उठाने चाहिए। वांगचुक लंबे समय से लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के दायरे में लाने, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और क्षेत्र की पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने की मांग उठा रहे हैं।
छठी अनुसूची के तहत लद्दाख को संवैधानिक संरक्षण मिले।
स्थानीय लोगों को भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार सुनिश्चित हों।
युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों में पर्याप्त अवसर बढ़ाए जाएं।
हिमालयी पर्यावरण और ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए विशेष नीति बनाई जाए।
विकास परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
वांगचुक का कहना है कि यह आंदोलन राजनीति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और हिमालय के संरक्षण की लड़ाई है।
भारत में भूख हड़ताल लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध का एक प्रभावी माध्यम रही है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार उपवास को अहिंसक हथियार बनाया। आजादी के बाद भी कई आंदोलनों में इस तरीके का इस्तेमाल हुआ।
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1. अन्ना हजारे का आंदोलन (2011)
लोकपाल कानून की मांग को लेकर अन्ना हजारे के अनशन को देशभर का समर्थन मिला। व्यापक जनदबाव के बाद सरकार को लोकपाल विधेयक पर आगे बढ़ना पड़ा।
2. पोट्टी श्रीरामलू (1952)
तेलुगु भाषी राज्य की मांग को लेकर उनके लंबे अनशन और निधन के बाद केंद्र सरकार ने अलग आंध्र प्रदेश राज्य के गठन का फैसला किया।
3. इरोम शर्मिला
मणिपुर में AFSPA हटाने की मांग को लेकर उन्होंने करीब 16 वर्षों तक अनशन किया। हालांकि यह दुनिया का सबसे लंबा भूख हड़ताल आंदोलन माना जाता है, लेकिन उनकी मुख्य मांग लंबे समय तक पूरी नहीं हो सकी।
हर भूख हड़ताल सफल नहीं होती। कई बार जनसमर्थन, राजनीतिक माहौल और सरकार की प्राथमिकताएं आंदोलन की दिशा तय करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वांगचुक का आंदोलन केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। यह जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अधिकारों जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को भी सामने ला रहा है। यदि आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिलता है और सरकार के साथ सकारात्मक बातचीत आगे बढ़ती है, तो समाधान की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि केंद्र सरकार की ओर से अब तक सभी प्रमुख मांगों पर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत की दिशा पर सभी की नजर रहेगी।
सोनम वांगचुक की 18 दिन की भूख हड़ताल ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध की कितनी प्रभावशीलता है। इतिहास बताता है कि कुछ अनशन सरकारों को बड़े फैसले लेने पर मजबूर कर चुके हैं, जबकि कुछ लंबे संघर्ष के बावजूद अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके। अब यह देखना अहम होगा कि लद्दाख से उठी यह आवाज सरकार के साथ संवाद के जरिए किसी ठोस समाधान तक पहुंचती है या नहीं।
18 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं सोनम वांगचुक।
लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की प्रमुख मांग।
पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अधिकार आंदोलन के केंद्र में।
अन्ना हजारे और पोट्टी श्रीरामलू के अनशन से सरकारें झुकी थीं।
इरोम शर्मिला का लंबा अनशन बड़ा उदाहरण रहा, लेकिन मुख्य मांग पूरी नहीं हो सकी।
अब सभी की नजर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संभावित बातचीत पर है।
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