दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री सार्वजनिक न करने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के आदेश को रद्द किया

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने 21 दिसंबर 2016 को एक आरटीआई याचिका के आधार पर दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को 1978 में बी.ए. परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी छात्रों, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल हैं, के रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था।

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यह याचिका आरटीआई कार्यकर्ता नीरज कुमार ने दायर की थी। सीआईसी ने माना कि विश्वविद्यालयों के ये रिकॉर्ड सार्वजनिक हैं और विश्वविद्यालय एक सार्वजनिक संस्थान है।

डीयू ने इसके खिलाफ 2017 में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। अदालत ने सुनवाई के पहले ही दिन सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी।

25 अगस्त 2025 (सोमवार) को न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने सीआईसी के आदेश को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि डीयू की प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री सार्वजनिक करने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि "निजता का अधिकार जानने के अधिकार से ज़्यादा महत्वपूर्ण है"। उन्होंने कहा कि डीयू अदालत को रिकॉर्ड दिखा सकता है, लेकिन इसे "अजनबियों" (आरटीआई उपयोगकर्ताओं) को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

दूसरी ओर, आरटीआई आवेदक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि यह जानकारी सार्वजनिक है, क्योंकि विश्वविद्यालय इसे नोटिस बोर्ड, वेबसाइट और समाचार पत्रों पर प्रकाशित करते हैं; इसलिए आरटीआई इसे उपलब्ध कराने का अधिकार देता है।

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निष्कर्ष: दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश स्पष्ट है—सीआईसी का यह निर्देश अवैध है, और डीयू पर डिग्री या संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से साझा करने का कोई दायित्व नहीं है। यदि आप चाहें, तो रिकॉर्ड अदालत को व्यक्तिगत रूप से दिखाया जा सकता है, लेकिन इसे आरटीआई के माध्यम से सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।